New Poetry Two Lines – दीदार की तलब

दीदार की ‘तलब’ हो तो नज़रे जमाये रखना ‘ग़ालिब’;
क्युकी, ‘नकाब’ हो या ‘नसीब’… सरकता जरुर है।








Updated: April 18, 2017 — 4:38 pm

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